कीमतों की मार

 प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को शिकायत है कि उनकी सरकार को वैसा ‘हनीमून पीरियड’ नहीं मिला, जैसा दूसरी सरकारों को मिला था। पर इसके लिए कौन जिम्मेवार है? वे महंगाई रोकने का वादा कर सत्ता में आए हैं। मगर इस दिशा में आगे बढ़ने के बजाय, सवा महीने में ही उनकी सरकार ने कई ऐसे फैसले किए हैं जिनसे महंगाई और बढ़ती जा रही हैं। रेल किराए और माल भाड़े की वृद्धि के बाद अब पेट्रोल और डीजल के दाम में भी बढ़ोतरी कर दी गई है। गैर-रियायती रसोई गैस की कीमत में भी प्रति सिलेंडर साढ़े सोलह रुपए का इजाफा कर दिया गया है। इससे पहले सरकार ने चीनी के आयात शुल्क में एकमुश्त पचीस फीसद की बढ़ोतरी की थी, और इसकी घोषणा होते ही चीनी की कीमत दो रुपए प्रतिकिलो चढ़ गई। क्या ये महंगाई पर काबू पाने के कदम हैं? विडंबना यह है कि रेल किराए में चौदह फीसद और माल भाड़े में साढ़े छह फीसद की बढ़ोतरी रेल बजट आने से चंद रोज पहले की गई। क्या इसलिए कि रेल बजट को किराया और मालभाड़ा वृद्धि की खटास से अलग रख सुनहरे आवरण में  पेश किया जा सके? वर्ष 2012 में मोदी ने तत्कालीन प्रधानमंत्री को पत्र लिख कर रेल बजट से ऐन पहले माल भाड़े में की गई बीस फीसद की बढ़ोतरी को संसद की अनदेखी और आम लोगों पर अप्रत्याशित बोझ बताया था और उसे वापस लेने की मांग की थी। लेकिन अब उन्हें न संसद की अनदेखी नजर आई न लोगों पर पड़ने वाले बोझ की फिक्र हुई। पेट्रोलियम मंत्रालय रसोई गैस के दाम में प्रति सिलेंडर हर महीने पांच से दस रुपए की बढ़ोतरी का प्रस्ताव दे चुका है। उसे सिर्फ तीन महीने के लिए स्थगित रखा गया है, क्योंकि दिल्ली, हरियाणा और महाराष्ट्र के विधानसभा चुनाव होने हैं। जाहिर है, ये चुनाव होते ही सबसिडी वाले सिलेंडरों के भी दाम बढ़ने का सिलसिला शुरू हो जाएगा। पेट्रोल की खुदरा कीमत दो रुपए और चढ़ गई है। प्याज पर चुनाव में आंसू बहाने वाली भाजपा के राज में कुछ ही दिनों में इसकी कीमत दुगुनी हो गई है। अप्रैल में थोक मूल्य सूचकांक पर आधारित महंगाई दर 5.2 फीसद थी, जो मई में छह फीसद के कुछ ऊपर पहुंच गई। पर लोगों का वास्ता थोक बाजार से नहीं, खुदरा बाजार से पड़ता है जहां कीमतों की मार और अधिक होती है। फिर केवल खाद्य के मद को लें, तो उसकी महंगाई दर मई में साढ़े नौ फीसद पर पहुंच गई। रेलवे के माल भाड़े और पेट्रोल-डीजल की दरों में बढ़ोतरी का असर क्या होगा, यह बताने की जरूरत नहीं है। पिछले दिनों प्रधानमंत्री ने कहा कि उन्हें कड़े कदम उठाने होंगे, लोग इसके लिए तैयार रहें। इस तरह की भाषा मनमोहन सिंह भी बोलते रहते थे। जब आर्थिक सुधारों के नाम पर देश में बाजार-हितैषी नीतियां अपनाई गर्इं तभी से कड़े कदमों की वकालत की जाती रही है, यह कहते हुए कि बाद में इनके अच्छे नतीजे आएंगे। विचित्र है कि चौबीस साल बाद भी अभी तकलीफ उठाने और भविष्य में अच्छे नतीजे आने की बात कही जा रही है! कुछ सालों से कंपनियों को कर-रियायत के तौर पर कई लाख करोड़ रुपए की रकम भेंट चढ़ाई जाती रही है। उसके औचित्य पर कभी सवाल नहीं उठाया जाता, मगर कमजोर क्रयशक्ति वाली आबादी को मिलती आ रही सबसिडी नीति नियंताओं की आंख में चुभती रहती है और उसमें लगातार कटौती की जा रही है। इसलिए सवाल उठता है कि कथित कड़े कदम क्या सभी के लिए कड़े हैं? या, ज्यादातर लोगों के लिए कड़े हैं, और बाकी के लिए नरम?

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